Friday, May 7, 2021

اُس صنم ، اُس شعلہ رو ، اُس گل بدن کی روشنی
آئی ہے ظلمت کدے میں اک کرن کی روشنی

تیرے آنے سے ہماری بزمِ عشرت سج گئی 
ہو گئی دو چند شمعِ انجمن کی روشنی

خوں رلاتا ہے ہمیں شب بھر یہ ظالم ماہتاب 
چاندنی میں ہے نگارِ دل شکن کی روشنی

چاہیے ہے زیست کی تاریک راہوں میں مرے 
دیدہ و دل کو کسی عہدِ کہن کی روشنی 

 کشورِ نا آشنا کی تیرگی میں دم بدم 
یاد آتی ہے ہمیں صبحِ وطن کی روشنی  

سچ کہوں سمرن تو وہ بے سوز اور بے نور ہیں 
جن سخن میں ہو نہ اُس جانِ سخن کی روشنی

उस सनम, उस शोला-रू, उस गुल-बदन की रौशनी

आई है ज़ुल्मत कदे में इक किरन की रौशनी


तेरे आने से हमारी बज़्म-ए-इशरत सज गई

हो गई दो चंद शमअ-ए-अंजुमन की रौशनी


ख़ूँ रुलाता है हमें शब भर यह ज़ालिम माहताब

चांदनी में है निगार-ए-दिल शिकन की रौशनी


चाहिए है ज़ीस्त की तारीक राहों में मिरे

दीदा-ओ-दिल को किसी अहद-ए-कुहन की रौशनी


किश्वर-ए-ना आश्ना की तीरगी में दम-ब-दम

याद आती है हमें सुब्ह-ए-वतन की रौशनी


सच कहूँ सिमरन तो वह बे-सोज़ और बे-नूर हैं

जिन सुख़न में हो ना उस जान-ए-सुख़न की रौशनी


ہاں! نکال اٹھ کے خود اِس بندۂ نا قابل کو میرے جانے پہ ہے اصرار تری محفل کو نہ مجھے فکرِ معیشت ہے نہ اندیشۂ عشق جانے کیا خوف ہے کھاتا ہے جو م...