نہ دل بچا ہے کوئی دل لگانے کی خاطر
نہ کوئی ہستی ہے باقی مٹانے کی خاطر ۔
ترے جلالِ رخِ تابدار سے خورشید
ملے تو پیش کرے سر جھکانے کی خاطر ۔
اکیلا میں ہی نہیں، ہر کوئی یہ چاہتا ہے
تو مسکرا دے صنم اس زمانے کی خاطر ۔
عجب طلسم ہے جاناں ترے تبسّم کا
بنا ہو جیسے خزاں کو ہرانے کی خاطر ۔
جو غرقِ قلزمِ چشمِ حبیب ہیں سمرن
وہ مے کدے میں ہیں محفل سجانے کی خاطر ۔
ना दिल बचा है कोई दिल लगाने की ख़ातिर
ना कोई हस्ती है बाक़ी मिटाने की ख़ातिर ।
ना कोई हस्ती है बाक़ी मिटाने की ख़ातिर ।
तिरे जलाल-ए-रुख़-ए-ताबदार से ख़ुर्शीद
मिले तो पेश करे सर झुकाने की ख़ातिर ।
मिले तो पेश करे सर झुकाने की ख़ातिर ।
अकेला मैं ही नहीं, हर कोई यह चाहता है
तू मुस्कुरा दे सनम इस ज़माने की ख़ातिर ।
तू मुस्कुरा दे सनम इस ज़माने की ख़ातिर ।
अजब तिलिस्म है जानाँ तिरे तबस्सुम का
बना हो जैसे ख़िज़ाँ को हराने की ख़ातिर ।
बना हो जैसे ख़िज़ाँ को हराने की ख़ातिर ।
जो ग़र्क़-ए-क़ुलज़ुम-ए-चश्म-ए-हबीब हैं सिमरन
वो मै कदे में हैं महफ़िल सजाने की ख़ातिर ।
वो मै कदे में हैं महफ़िल सजाने की ख़ातिर ।
No comments:
Post a Comment