حلالِ تیغِ ستم کو بھی یاد کر جاناں
کسی بہانے تو ہم کو بھی یاد کر جاناں ۔
हलाल-ए-तेग़-ए-सितम को भी याद कर जानाँ
किसी बहाने तू हम को भी याद कर जानाँ ।
کسی بہانے تو ہم کو بھی یاد کر جاناں ۔
हलाल-ए-तेग़-ए-सितम को भी याद कर जानाँ
किसी बहाने तू हम को भी याद कर जानाँ ।
سیاہ رات دکھا دے سنوار کے زلفیں
نثارِ کاکل و خم کو بھی یاد کر جاناں ۔
स्याह रात दिखा दे सँवार के ज़ुल्फें
निसार-ए-काकुल-ओ-ख़म को भी याद कर जानाँ
اجڑ گیا تری رخصت کے بعد جانِ جہاں
ذرا وہ باغِ ارم کو بھی یاد کر جاناں ۔
उजड़ गया तिरी रुख़सत के बाद जान-ए-जहाँ
ज़रा वह बाग़-ए-इरम को भी याद कर जानाँ
خوشی سے محفلِ یاراں میں بیٹھ تو لیکن
کبھی مریضِ الم کو بھی یاد کر جاناں ۔
ख़ुशी से महफ़िल-ए-यारां में बैठ तू लेकिन
कभी मरीज़-ए-अलम को भी याद कर जानाँ
وہ سر پھرا وہی آشفتہ سر وہ دیوانہ
غلامِ روۓ صنم کو بھی یاد کر جاناں ۔
वह सर फिरा वही आशुफ्ता सर वह दीवाना
ग़ुलाम-ए-रू-ए-सनम को भी याद कर जानाँ
تجھے ہی مانگنے کے واسطے تھے ہاتھ اٹھے
گداۓ دیر و حرم کو بھی یاد کر جاناں ۔
तुझे ही माँगने के वास्ते थे हाथ उठे
गदा-ए-दैर-ओ-हरम को भी याद कर जानाँ
برستا تھا یہ جی بھر کے تمھارے ہوتے ہوۓ
یہ خشک ابرِ کرم کو بھی یاد کر جاناں ۔
बरसता था यह जी भर के तुम्हारे होते हुए
यह ख़ुश्क अब्र-ए-करम को भी याद कर जानाँ
وگرنہ کب تھا غزل گوئی تیرے بس کا کام ؟
کمالِ صحبتِ غم کو بھی یاد کر جاناں
?वगरना कब था ग़ज़ल गोई तेरे बस का काम
कमाल-ए-सोहबत-ए-ग़म को भी याद कर जानाँ
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