ہاں! نکال اٹھ کے خود اِس بندۂ نا قابل کو
میرے جانے پہ ہے اصرار تری محفل کو
نہ مجھے فکرِ معیشت ہے نہ اندیشۂ عشق
جانے کیا خوف ہے کھاتا ہے جو میرے دل کو
فکر کیوں ہو مجھے دنیا کی جو اک لمحے میں
بھول جائے گی مری ہستئ لا حاصل کو
!عشق کا رازِ نہاں عقل پہ کھلنا مشکل
کیا خبر راہِ جنوں کی خردِ غافل کو
درد کوئی نہ محبت نہ زمانے نے دیا
زخم سارے میں نے خود ہی دیے اپنے دل کو
زندگی اپنی اگر پیاری ہے تم کو سمرن
کیوں بسایا ہوا ہے دل میں پھر اک قاتل کو
हाँ! निकाल उठ के ख़ुद इस बंदा-ए-ना-क़ाबिल को
मेरे जाने पे है इसरार तिरी महफ़िल को
न मुझे फ़िक्र-ए-मईशत है न अंदेशा-ए-इश्क़
जाने क्या ख़ौफ़ है खाता है जो मेरे दिल को
फ़िक्र क्यों हो मुझे दुनिया की जो इक लम्हे में
भूल जाएगी मेरी हस्ती-ए-ला-हासिल को
इश्क़ का राज़-ए-निहाँ अक़्ल पे खुलना मुश्किल!
क्या ख़बर राह-ए-जुनूँ की ख़िरद-ए-ग़ाफ़िल को
दर्द कोई न मोहब्बत न ज़माने ने दिया
ज़ख़्म सारे मैं ने ख़ुद ही दिए अपने दिल को
ज़िंदगी अपनी अगर प्यारी है तुम को सिमरन
क्यों बसाया हुआ है दिल में फिर इक क़ातिल को